किरदार




वैसे तो मैं बहुत कम लगभग न के बराबर किसी के बारे में लिखता हूं, लेकिन आज जरूरी समझा एक शख्स के बारे में लिखने के लिए. महाशय का नाम विवेक पाठक है, भोपाली सूरमा हैं, पंगा मत लिजिएगा नहीं तो नंगा कर देंगे. अंतरराष्ट्रीय मामलों के अच्छे जानकार हैं. सीधी सपाट बात करते हैं. उनके शब्दों में कुछ गिनेचुने दोस्त हैं, जिनमें सौभाग्यवश मैं भी शामिल हूं. मैं तो खलिहर इंसान हूं, लेकिन महोदय बहुत बिजी रहते हैं, इसलिए तो ईटीवी भारत ज्वाइन किए हमें तकरीबन डेढ़ साल हो गए, लेकिन हम कभी आधा घंटा भी साथ में नहीं बैठे होंगे. कई बार मिलने का प्रोग्राम बना लेकिन मिल नहीं पाए. आज भी मिलने का प्रोग्राम था, लेकिन मिलने के आसार नहीं दिख रहे थे, क्योंकि महोदय को किसी जरूरी काम से कहीं जाना था. चूंकि सुबह हमने एक दूसरे से वादा किया था मिलने का, इसलिए मैने दो बार कॉल भी किया, लेकिन उठा नहीं. मैं समझ गया आज का प्रोग्राम भी केवल प्रोग्राम बनकर रह जाएगा. कई बार मिलने का वादा हुआ. टूटा. आज भी वादा दम तोड़ रहा था. अचानक शाम के लगभग साढ़े 7 बजे मेरे मोबइल की रिंगटोन तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया बजती है.

हैलो! कहां हो?
कमरे पर. तुम कहां हो?

कमरे पर.
फोन क्यों नहीं उठाया?
अरे यार सो गया था, इसलिए तुम्हारा फोन नहीं उठाया.
तो आ रहे हो न?
हम्म्म्म… मैं तेरे को कुछ देर में फोन करता हूं.
अच्छा. 

10 मिनट बाद मुझे फोन आता है. मैं फलाने जगह आ रहा हूं तुम भी पहुंचों. 10 मिनट में मिलते हैं. चूंकि हम दोनों समय के पाबंद है. बताए हुए जगह पर दोनों पहुंचते हैं. इसके बाद फिर जो महफिल बैठी तो घंटों चली.
पाठक जी इतना लिखना जरूरी था. पता नहीं फिर कब साथ में घंटों बैठने का मौका मिले. समय बलवान है और कीमती भी सो शुक्रिया तुम्हारा. आशा है जल्द फिर मिलेंगे. 

Comments