यह छोटी सी कविता एक 9 साल के लड़के की है, जो अपने बिछड़े हुए पिता की तलाश में कही किसी मुकाम पर
कहता है-
कि क्यों बिखऱ गए मेरे सपने जो घर से निकलते हुए देखे थे,
छूट गए अपने जो कभी साथ रहने का वादा करते थे,
टूट गए जो कभी मेरे रुठने पर,
मनाने की तमाम जतन करते थे।
कि बात-बात पर शेर बेटा कहलाने वाला,
आज 'जानवरों' की इस दुनिया में सहम सा गया है,
धैर्य और आत्मविश्वास के साथ कैसे लड़ूं,
फिर जब तुम इसकी कहानी सुनाया करते थे।
किस-किस से कहूं अपने इस भय की दास्तां,
दर-दर भटका 'आपकी' तलाश में, लेकिन ठोकरे, दुत्कार मिली,
एक बार वहीं कहकर साहस भर दो
सही राह पर चलोगे तुम्हे मेरा वास्ता।
कि गर अब अकेले ही सफर करना है,
तो बतलाओ कैसे अपनी संवेदना, निस्वार्थ, मासूमियत के साथ,
इस स्वार्थ और छल की दुनिया में फिर से सपने देखूं,
जो तुमने कभी संजोने के वादे किये थे।

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