कमरे में एक खिड़की है, वहां तक मैं जाता हूँ।
कुछ ऊंची है खिड़की मुझसे, ये सोच के घबराता हूँ ।जिद में फिर उस तक पहुँचने की,
बड़ी तरकीब लगाता हूँ ।
बाबा मुझे दिखते नहीं, मां को मैं बुलाता हूँ ।
आश पर वह आई नहीं, फिर जोर लगाता हूँ ।
कमरे में एक खिड़की है, वहां तक मैं जाता हूँ ।
कश्मकश की इस कसौटी पर खरा उतर नहीं,
जद्दोजहद में समय गुजरा और उम्मीद खो जााता हूँ।
पीछे से इक आवाज आई, बेटा, उठ खड़ा हो राजा
आश पर वह आई नहीं, फिर जोर लगाता हूँ ।
कमरे में एक खिड़की है, वहां तक मैं जाता हूँ ।
कश्मकश की इस कसौटी पर खरा उतर नहीं,
जद्दोजहद में समय गुजरा और उम्मीद खो जााता हूँ।
पीछे से इक आवाज आई, बेटा, उठ खड़ा हो राजा
बेटा।
चार साल हूँ मैं मासूम, नाजायज कहलाता हूँ ।
कमरे में एक खिड़की है, वहाँ तक मैं जाता हूँ ।

Comments
Post a Comment