सड़कें पूछती हैं, गलियां तंग करती हैं



कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया तो में अपना कहर बरपा रखा है. इसने मेरी दुनिया में भी कोई रहम की गुंजाइश नहीं छोड़ी है. अकेलापन तो अच्छा लगता था, लेकिन इस 2019 में चीन की पैदाइश कोविड ने इतना अकेला कर दिया है कि कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है अब. कुछ दिनों पहले जिस बालकनी से खिल-खिलाते चेहरे नजर आते थे, वहां से अब मुरझाए-मुरझाए से चेहरे दिखते हैं. घंटों बालकनी में टहलते हुए बाहर सड़कों पर लोगों को आते जाते देखना, बच्चों को खेलते देखना, मां की अंगुलि पकड़े मासूमों को जिद करते देखना, ये सब, अब लगता है किसी दूसरे सदी की बात है. 


सड़के सुनसान है. दूर-दूर तक कोई दिखाई ही नहीं देता. 'सड़कों की ओर देखने पर ऐसा लगता मानो अभी ये बोल उठेंगी और मुझसे ये पूछ बैठेंगी कि बताओं आखिर लोग गए कहां, ये खाली-खालीपन का बोझ मुझसे सहा नहीं जाता. तुम जाओ और सबसे कह दो कि मैं उनका इंतजार कर रही हूं और फिर से हंसते-मुस्कराते हुए चेहरों से मुझे गुलजार कर दो.' 

'गलियां मुझे अलग तंग करती है. कहती है क्यों कोई बच्चा अब खेलने नहीं आता. ना अब कोई चहल-पहल होती है, ना कोई अब अपने दरवाजे से आवाज देता है. ना बंटी अब मुझे पुकारता है. ना अब वो आवाजें सुनाई देती हैं, जब मांए चिल्लाते हुए कहती थीं, जा थोड़ा सामने वाले दादा के दुकान से हल्दी लेते आ. असल में गलियां अब मायूस रहती हैं. 

मैं कैसे इनको समझाऊं कि उनसे ज्यादा मैं परेशान हूं. जैसे गलियों को कोई नहीं पुकारता, सड़कें खाली-खालीपन सा महसूस करती हैं. ठीक वैसा मैं करता हूं महसूस. ना कोई पुकारने वाला है, ना कोई हंस के दो बात करने वाला है. एकदम घूटा-घूटा सा रहता हूं, मानो पिंजरे में कैद हूं. कभी-कभी काले-काले बादलों से बातें कर लेता हूं, लेकिन वो भी अभी कहीं-कहीं बरसने में बिजी हैं.

 असल में इस कोरोना वायरस ने सबको डरा दिया है. क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर किसी को इस 2019 में चीन की पैदाइश कोविड ने नहीं बख्शा है. मैं भी सहमा हूं. सोचता हूं कि कब ये महामारी खत्म होगा, कब तक यूं डर के पिंजरे में कैद रहूंगा.

फोटो: गूगल

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